सरोजिनी नायडू
भारत कोकिला के नाम से मशहूर सरोजिनी नायडू भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन को एक प्रमुख नेत्री थी। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को अध्यक्ष बनने वाली वे पहली नेता थी।
श्रीमती सरोजिनी नायडू का जन्म हैदराबाद (निजाम) में 13 फरवरी 1879 को हुआ था। उनके पिता डॉक्टर अघोरनाथ चट्टोपाध्याय काफी समय से हैदराबाद में रहते थे। एडिनबरो विश्वविद्यालय से रसायन शास्त्र में डॉक्टर ऑफ साइंस की उपाधि अर्जित करके हैदराबाद में उन्होंने अंग्रेजी माध्यम से कॉलेज की स्थापना की जो कलान्तर में निजाम कॉलेज के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
वह स्वयं अंग्रेजी के अतिरिक्त फ्रेंच, जर्मन, रूसी और हिब्रू भाषाओं के प्रकांड पंडित थे। सरोजिनी को भाषा व साहित्य से अनुराग उत्तराधिकार में प्राप्त हुआ था। साहित्य की स्त्रोस्विनी में उनके अतिरिक्त उनके अनुज हरिन्द्र चट्टोपाध्याय, बाद में उस कॉलेज के पिंसिपल भी बना दिए गए थे। बालिका सरोजिनी बहुत कुशाग्र बुद्धि की थी। अपनी पढ़ाई-लिखाई के साथ वह काव्य की ओर अधिक उन्मुख थीं।
अल्पायु में ही वह तुकबन्दी करने लगी थीं। जब वह ग्यारह वर्ष की थीं तब बीजगणित के कठिन प्रश्न का उत्तर न कर सकने की स्थिति में उन्होंने उस कापी पर ही एक कविता रचना आरम्भ कर दी थी। वह उनका प्रथम प्रयास था। छह दिन तक निरन्तर मन लगाकर उन्होंने कविता पूरी की। कविता लम्बी थी। 'लेडी ऑफ द लेक' उस लगातार परिश्रम के कारण वह बीमार तक पड़ गईं। वह बीमारी वरदान प्रमाणित हुई बीमार स्थिति में उन्होंने लेटे-लेटे 'लेडी ऑफ द लेक' को सम्पादित किया और काट-छाँटकर सौ पंक्तियों की सुन्दरव व्यवस्थित कविता बना ली। उन्हीं दिनों उनकी कविताओं का संग्रह 'पोयम्स' के नाम से प्रकाशित हुआ।
पिता डॉक्टर अघोरनाथ ने अपनी बिटिया के प्रस्फुटित काव्य-कुसुम की धारा को भली-भाँति भाँप लिया। उन्होंने प्रोत्साहित किया, शाबाशी से पीठ ठोकी, परन्तु साथ ही समझाया कि सरोजनी कम-से-कम मैट्रिकुलेशन की परीक्षा पास कर ले। उसके पश्चात् कविता का खुला आकाश अपनी बाँहें पसारे उस नई कवयित्री का स्वागत करते हुए मिलेगा, जिसमें वह विचरण करने के लिए स्वतन्त्र होंगी। पिता के द्वारा दिखाए गए सुनहरे सपनों से सरोजिनी अभिभूत हो गई। उन्होंने अपने काव्य कुसुम को सहला कर एक और स्थगित कर दिया- केवल कुछ समय के लिए और वह पढ़ाई में लग गई। उन दिनों नारी शिक्षा के प्रति समाज अधिक उत्साही नहीं था। हैदराबाद में लड़कियों को केवल 'मिडिल' (आठवीं कक्षा) तक शिक्षा का प्रबन्ध था।
अतः आगे की शिक्षा के लिए सरोजिनी को मद्रास भेजा गया जहाँ से बारह वर्ष की आयु में उन्होंने मैट्रिकुलेशन की परीक्षा प्रथम श्रेणी से पास कर ली। उस अनोखी उपलब्धि को समाचार पत्रों में विशेष रूप से सुचित प्रकाशित किया गया। किन्तु उससे आगे वह शिक्षा प्राप्त नहीं कर पाई। मैट्रिक पास कर लेने के पश्चात् सरोजिनी हैदराबाद आ गई। और नियमित रूप से लेखन में लग गई। इसी बीच उन्होंने दो हजार पंक्तियों का एक फारसी नाटक 'मेहर मुनीर' का अंग्रेजी रूपान्तर लिखा। पिता ने अपनी बेटी को प्रोत्साहित करने के हेतु उस नाटक को प्रकाशित करवा दिया।
प्रकाशित नाटक की प्रतियाँ उन्होंने अपने सभी परिचितों को प्रेषित की ताकि सरोजिनी की उस रचनात्मक उपलब्धि की जानकारी व्यापक हो सके। उस 'सामूहिक' वितरण के अर्न्तगत एक प्रति हुजूर निजाम की सेवा में भी पहुँचाई गई। निजाम ने नाटक पढ़ा और प्रसन्नता व्यक्त की साथ ही विशेष छात्रवृति देकर सरोजिनी को आगे पढ़ाई के लिए विलायत भेजने की व्यवस्था कर दी। ज्ञान की रुकी स्रोतस्विनी के रुके हुए बाँध को पुनः खोल दिया। सरोजिनी के लिए इंग्लैंड में शिक्षा व साहित्य का पथ अधिक प्रशस्त हो गया। इंग्लैंड में कम आयु के कारण उन्हें 'कैम्ब्रिज' में प्रवेश नहीं मिल सका। इस75
कारण उन्हें लन्दन में किंग्स कॉलेज में प्रवेश लेना पड़ गया। लन्दन में उनकी भेंट उनके नामवर साहित्यकारों से हुई।
सरोजिनी के काव्य पक्षी को उड़ सकने के लिए अंग्रेजी के साहित्यिक संसार के दिग्गजों को प्रोत्साहनस्वरूप आलम्बन मिला, तो उन कविता में चार चाँद लग गए। इसी दौरान सरोजिनी की भेंट प्रसिद्ध समीक्षक श्री एडमंड गौसे से हुई। उन्होंने सरोजिनी की काव्य प्रतिभा परिमार्जित की। उनकी रचनाओं पर टिप्पणी करने हुए श्री गौसे ने सरोजिनी को सलाह दी 'तुम जैसी प्रतिभा सम्पन्न भारतीय रचानाकार से मैं अपेक्षा करता हूँ कि पश्चिमियों को अपने भारत देश के दर्शन कराओ, तुम्हारी रचानाओं में भारत की आत्मा के दर्शन होना चाहिए'।
श्री गौसे से सरोजिनी बहुत प्रभावित हुई। उन्हें अपना गुरु मान लिया था। श्री गौसे के परामर्श को सरोजिनी देवी ने गुरु वचन मानकर शब्दश: आत्मसात् कर लिया। अपनी रचनाओं में अपने देश की मिट्टी की सुगन्ध को समाहित करने का प्रयास करने लगीं।
इंगलैंड प्रवास उन्हें सामान्यतः कई विशेषकर दो अत्यन्त महत्वपूर्ण लाभ हुए। एक तो उनकी भेंट एक भारतीय तेलुगू युवक डॉक्टर गोविन्द राजुलू नायडू से हुई। वह भेंट घीरे-धीरे उनके जीवन की वैजयन्ती माला बनकर उनके गले में मंगल सूत्र बनकर झूलने लगी। जब वह शिक्षा पूरी करके स्वदेश लौटीं तो अपने मिता की सहर्ष सहमति के साथ डॉक्टर गोविन्द राजुलू नायडू से विवाह रचा लिया।
उस समय अन्तर्जातीय विवाह किसी भी भारतीय समाज में पाप जैसा 'अधर्म' माना जाता था। बंगाली व तेलुगू दोनों समाजों में उस 'अधर्म' के विरुद्ध बवंडर जैसा 'आन्दोलन' छिड़ गया। परन्तु क्रान्तिकारी एवं प्रगतिशील विचारों में परिपक्व एवं दृढ़ निश्चयी डॉक्टर अघोरनाथ चट्टोपध्याय सबके विरुद्ध अडिग चट्टान की भाँति अटल खड़े रहे और अपनी बेटी सरोजिनी देवी का पाणिग्रहण डॉक्टर गोविन्द राजुलू नायडू के साथ करा दिया।
डॉक्टर अघोरनाथ ने स्वयं कन्यादान किया और वर-वधू को सहर्ष आशीर्वाद दिया। इससे दूसरा लाभ हुआ-सरोजिनी को हिन्दी का ज्ञान। वह भली-भाँति हिन्दी बोलने लगी थीं। इसके सहारे भविष्य में भारत भ्रमण के दौरान देशवासियों को जानने-समझाने में बड़ा सहयोग मिला।
स्वदेश लौटकर, विवाह हो जाने के पश्चात् सरोजिनी नायडू ने स्वयं को • मात्र हैदराबाद (निजाम) की रियासत की सीमा में बाँधकर नहीं रखा। इंग्लैंड में रहकर उन्होंने शेष (ब्रिटिश) भारत की सामाजिक, आर्थिक स्थिति के साथ अंग्रेजों की ‘बाँटो और राज करो' की नीति के तहत साम्प्रदायिक वैमनस्य को जानकारी प्राप्त कर ली थी। इस कारण भी वह रियासत छोड़ समूचे देश की रियासत की ओर आकर्षित हो गई थीं। वह श्री गोपालकृष्ण गोखले से मिलीं। उनके वक्तव्य से वह बहुत प्रभावित हुई। उनके ही आदेशानुसार उन्होंने सम्पूर्ण देश का भ्रमण किया और अपने ओजपूर्ण गीतों व भाषणों से जनमानस को अनुप्राणित किया। अपनी रचनाओं के ही कारण उन्हें 'भारत कोकिला' कहा जाने लगा। गांधीजी के साथ भारत दर्शन के दौरान देश की आत्मा से उनका परिचय हुआ। देश की मिट्टी की सुगन्ध से उन्की पहचान हुई जिसे उन्होंने अपनी रचनाओं में चित्रित किया। 1917 में डॉक्टर एनी बेसेन्ट कांग्रेस की अध्यक्ष थीं। उन्हीं की प्रेरणा से 18 दिसम्बर को महिला को समान मताधिकार की माँग लेकर उनके नेतृत्व में देश की 18 प्रमुख महिलाओं का प्रतिनिधिमंडल तत्कालीन वायसराय लार्ड चेम्सफोर्ड एवं भारत मन्त्री मिस्टर मांटेग्यू से मिला और माँग प्रस्तुत की कि पुरुषों के समान स्त्रियों को समान शर्तों पर पताधिकार दिए जाएँ। जिस माँग को मनवाने के लिए इंग्लैंड की महिलाओं को 80 वर्ष लग गए, उसी माँग को पूरा करने के लिए भारत में केवल पाँच वर्ष लगे।
प्रजातन्त्र के पथ पर पहला पग था और विश्व की अपूर्ण घटना थी। तभी, डॉक्टर एनी बेसेन्ट की अध्यक्षता में आयोजित हो रहे कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशन के मंच पर एक बार श्रीमती सरोजिनी नायडू ने सिंह गर्जना की थी 'एक महिला के कारण मैं अपसे कहना चाहती हूँ : जब भी आप (पुरुष) अँधेरे में भटक जाएँ आत्मविश्वास की क्षीणता के कारण आपको कोई उचित रास्ता न मिले और आपको एक सच्चे नेतृत्व की आवश्यकता महसूस हो तब आप अपने कन्धे से कन्धा मिलाकर आपका पथ निर्देशनार्थ हम भारतीय नारियों को ही पाएँगे। हम नारियाँ ही आपकी शक्ति की ज्योति बुझने नहीं देंगी' सम्पूर्ण सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से बहुत देर तक गूँजता रहा सभापति डॉक्टर ऐनी बेसेन्ट के नेत्रों में खुशी के आँसू छलक आए। महात्मा गांधी एवं कई अन्य शीर्ष नेताओं के कंठ भर आए। सारे वातावरण में एक मनमोहक रोमांच छा गया। इसीलिए कहा गया है कि प्रत्येक पुरुष की सफलता के पीछे नारी का योगदान होता है।
1918 में जिनेवा में आयोजित स्त्री मताधिकार परिषद् के अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलन में भारत की ओर से श्रीमती सरोजिनी नायडू ने भाग लिया। वहाँ के अन्तरराष्ट्रीय मंच पर उन्होंने नारी का पक्ष बहुत प्रभावित ढंग से प्रस्तुत किया। उनके ओजपूर्ण एवं तेजस्वी भाषण सुनकर सभी स्तब्ध हो गए- मन्त्रमुग्ध से। एक अमरीकी श्रोता ने कह दिया कि भारत से जो भी वक्ता अपना पक्ष प्रस्तुत करता है वह इतना युक्तियुक्त एवं तर्कसंगत होता है कि उससे मुँह फेर लेने की गुंजाइश ही नहीं रहती। इससे पूर्व वह स्वामी विवेकानन्द को सुन चुका था। उसे श्रीमती सरोजिनी नायडू के भाषण में स्वामी विवेकानन्द के ही स्वरों के अनुगूँज सुनाई देती प्रतीत हो रही थी। अगले वर्ष 1919 में भारत में जालियाँवाला हत्याकांड की अमानुषिक घटना घट गई। सारे देश में विरोध की चिंगारियाँ चटकने लगीं।
गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने अंग्रेजों द्वारा प्रदत्त 'सर' की मानद उपाधि वापस कर दी। विरोध की आवाज घनी और तीव्र हो गई। श्रीमती सरोजिनी नायडू भी शान्त नहीं बैठीं। असहयाग की आग भड़क उठी थी। 'होमरूल लीग' की स्थापना की गईं। जुलाई 1919 में होमरूल लीग के प्रतिनिमंडल के सदस्य के रूप में लन्दन की यात्रा की। वहाँ, किंग्सले सभागार में उन्होंने उसी तेवर के साथ जलियाँवाला हत्याकांड की तीखी निन्दा की और हत्याकांड के के से अमानुषिक तथ्यों को प्रस्तुत करके वहाँ के अंग्रेज श्रोताओं के सिर लाज से झुका दिए। उनके भाषण से पूर्व लन्दन की जनता हत्याकांड के सम्बन्ध में इतना कुछ जानती भी नहीं थी।
किंग्सले सभागार में भारत कोकिला के उस भाषण से सभी की आँखें खुल गई। जनरल डायर की बेदर्द करतूतों का भाँडा फूट चुका था। ब्रिटिश आधुनिक भारत की प्रसिद्ध महिलाएं सरकार ने उस पर मुकदमा चलाया। भावनाओं पर ठीक चोट करना श्रीमती सरोजिनी नायडू का ही काम था। उसमें ही उनकी विजय निहित होती थी। 1925 में कानपुर के कांग्रेस अधिवेशन में उन्हें कांग्रेस का अध्यक्ष चुना गया। यह पहला अवसर था जब कांग्रेस के अध्यक्षीय आसन पर एक भारतीय महिला आरूढ़ हुई थी। वैसे, इससे पूर्व डॉ. ऐनी बेसेन्ट भी कांग्रेस की अध्यक्ष रह चुकी थीं परन्तु वह भारत मूल की महिला नहीं थीं- यद्यपि उन्होंने भारतीय जनता की भरसक सेवा की थी और उसके बदले में भारतीय जनता का भरपूर प्यार मिला था। 1928 में उन्होंने अमरीका की यात्रा की और गांधीबाद का तर्कसंगत ढंग से प्रचार किया।
1930 में भारत लौटकर नमक सत्याग्रह में भाग लिया। डाँडी पद यात्रा में वह गांधीजी के ही साथ थीं। 23 मई को वह गिरफ्तार हो गई। जेल में रहकर वह चुप नहीं बैठीं। लिखने-पढ़ने के अतिरिक्त संगठन का काम करती रहीं।
1931 में गांधी-इरविन वार्ता हुई और उसी समझौते के फलस्वरूप लन्दन में आयोजित गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने गांधीजी को लन्दन यात्रा करनी पड़ी। गांधीजी के साथ श्रीमती सरोजिनी नायडू भी लन्दन गई। यद्यपि, जैसी कि उम्मीद थी गोलमेज सम्मेलन सफल नहीं हो सका फिर भी गांधीजी के चुम्बकीय व्यक्तित्व और श्रीमती सरोजिनी नायडू के चमत्कारी व्यक्तित्व ने सम्पूर्ण लन्दन को सम्मोहित कर दिया। वे जहाँ भी जाते हैं, अखबार वालों के साथ नए-नए प्रशंसकों का झुंड उन्हें घेर लेता और प्रशनों की झड़ी लग जाती। उनके उत्तर भी सदा सन्तोषजनक मिलते रहते। गोलमेज सम्मेलन से खाली हाथ लौटे गांधीजी को जेलयात्रा करनी पड़ गई फिर 1932 के सत्याग्रह में भी अनेक कांग्रेसी नेताओं को जेल जाना पड़ा।
1941 के व्यक्तित्व सत्याग्रह की पहल के लिए विनोबा भावे को चुना गया। उस सत्याग्रह के अन्तर्गत देश की बड़ी उथल-पुथल दिखाई दी। द्वितीय विश्वयुद्ध में अंग्रेजों की गरदन बुरी तरह से फँसी हुई थी। ऐसे उलझे हुए दिनों में विरोध की कैसी भी आवाज उठाने का मतलब था मधुमक्खियों के छत्ते को छेड़ देना। फिर भी आन्दोलन का सूत्रपात हो गया था। श्रीमती सरोजिनी नायडू के
शान्त कैसे बैठ सकती थीं। एक प्रकार से, उस सूत्रपात की परिणति 1942. "आधुनिक भारत की प्रसिद्ध महिलाएं
'भारत छोड़ो' की क्रान्ति के रूप में हुई। बम्बई में कांग्रेस के अधिवेशन में गांधीजी द्वारा उक्त प्रस्ताव प्रस्तुत किया जिसे सर्वसम्मति से ध्वनिपूर्वक स्वीकार कर लिया गया। योजना के अनुसार दूसरे दिन गांधीजी को उक्त प्रस्ताव लेकर वायसराय से भेंट करनी थी परन्तु दूसरे दिन सभी शीर्ष नेताओं को गिरफ्तार करके बिल्कुल अनजान स्थान पर भेज दिया गया। गांधीजी को पूना के आगा खाँ महल में रखा गया। श्रीमती सरोजिनी नायडू को गांधीजी के साथ रखा गया।
1943 में गांधीजी ने इक्कीस दिनों का उपवास किया, जिसके कारण कुछ दिनों के पश्चात् गांधीजी का स्वास्थ बिगड़ना आरम्भ हो गया। सरकार की ओर से दो डॉक्टर, गांधीजी के स्वास्थ्य पर निरन्तर नजर रख रहे थे। डॉक्टर वी. सी. राय और गांधी के सचिव प्यारेलाल की बहन डॉक्टर सुशीला नैयर भी उनको देखभाल कर रहे थे। फिर भी श्रीमती सरोजिनी नायडू ने गांधीजी की सेवा-टहल करने में दिन-रात एक कर दिए। सेवा के कारण वह स्वयं बीमार हो गयी। बीमारी की गम्भीरता देखकर सरकार ने उन्हें गांधीजी से पहले मुक्त कर दिया।
1945-46 तक लगभग सभी नेता बाहर आ गए थे। इंगलैंड में मन्त्रिमंडल बदल गया। नए मन्त्रिमंडल ने भारत को स्वतन्त्रता देने का मन बना लिया। इसी इरादे के तहत भारत में तत्कालीन वायसराय लार्ड वेबिल के स्थान पर महारानी विक्टोरिया के पौत्र लार्ड माउंट बेटन ने रायसीना की पहाड़ी पर बने वायसरीगल हाउस में प्रवेश किया। उन्होंने भारत के विभिन्न दलों के प्रतिनिधियों से विचार-विमर्श किया। उस विचार-विमर्श के सत्रों में भारत के सचिवलाई पेथिक लारेंस की अध्यक्षता में इंग्लैंड से आए कैबिनेट मिशन ने भी निरन्तर भाग लिया और समस्याओं को सुलझाने का ईमानदारी से प्रयास किया। सर्वमान्य एक निर्णय के अनुसार लार्ड माउंट बेटन की अध्यक्षता में भारत की अन्तरिम सरकार का गठन किया जिसके उपाध्यक्ष हुए पं. जवाहरलाल नेहरू । उसी दौरान, 1947 में (15 अगस्त से पूर्व) पं. जवाहरलाल नेहरू ने नई दिल्ली के पुराने किले में एशियन रिलेशन कांफ्रेंस का आयोजन किया जिसमें एशिया के नए स्वतन्त्र देशों ने भाग लिया और उसकी अध्यक्षता की भारत कोकिला श्रीमती सरोजिनी नायडू ने। आधुनिक भारत की प्रसिद्ध महिलाएं
कटाक्ष किया और कहा था-बापू आपकी सादगी बहुत महँगी पड़ती है। एक बार जब पं. जवाहरलाल नेहरू कुछ छात्राओं से घिरे उन्हें अपना आटोग्राफ दे रहे थे तब उन्हेंने व्यंग्य कसा था। और कहा, 'जवाहर भाई, टोपी तो उतारो, ताकि इन लड़कियों का भ्रम दूर हो जाए कि तुम जवान नहीं हो'। राजनीतिक व सामाजिक कार्यक्रमों से जब भी अवकाश मिलता तो वह तुरन्त अपने परिवार से जा मिलती थीं। तब वह एक निपुण गृहिणी की भाँति अपने पति व बच्चों के बीच, जितना सम्भव होता, रहतीं और अच्छे-अच्छे व स्वदिष्ट स्यंजन अपने हाथों से पकाकर खिलाती थीं
काव्य-सृजन के लिए कोई निश्चित समय अथवा स्थान की आवश्यकता नहीं थी। जब भी उनकी संरचना से आकाश पर भावनाओं से युक्त अँगूरी घटाएँ घुमड़ने लगतीं, तभी उद्गारों के मोती शब्द बनकर मोती की भाँति बरसने लगते और वे ही गुँथ जाते। आँख मिचौली करती आँखों के झरोखों से झाँकती कविता की पंक्तियों की बसन्ती इन्द्रधनुषीय वैजयन्ती माला एक प्रश्न के उत्तर में उन्हेंने मुस्कराते हुए कहा था, काव्य सृजन के लिए समय निकालने की आवश्यकता नहीं पड़ती। वह स्वतः प्रस्फुटित होती है। कविता उनके रोम-रोम में समाई हुई थी। कविता उनकी प्रकृति थी। कविता उनकी प्राण थी। अपने प्यारे शहर हैदराबाद पर लिखे अनेक गीत उनके जीवन की सर्वाधिक मूल्यवान् निधि है 'लेडी ऑफ द लेक' की रचना सम्भवतः हैदराबाद व सिकन्दराबाद के बीच फैले हुए हुसैन सागर से प्रेरित लगती है। जलियाँवाला हत्याकांड के राष्ट्रीय आघात से प्रभावित उनकी 'ब्रोकन विंग' (टूटा पंख) की रचना थी, 'लेडी ऑफ द लेक' फन्तासी युक्त रचना थी और कोमल संवेदनशील भावना से छलछलाती रचना थी।
इसके अतिरिक्त एक फूल, एक पंछी, एक हँसी, एक किरण, ओस की एक बूँद, 'पहले सपनों का एक परी संसार' आदि रचनाओं की काफी चर्चा होती रही है। उनकी अनेक कविताएँ शिक्षा के अनेक पाठ्यक्रमों के माध्यम से देश की कई पीढ़ियाँ लाभान्वित होती रही हैं और होती रहेंगी। श्रीमती सरोजिनी नायडू को नारी कल्याण के कार्यक्रमों से अलग कर पाना असम्भव है। वह नारी उत्थान के लिए कटिबद्ध थीं। आरम्भ से ही इसके अनेक कार्यक्रमों में 82
व्स्त रहीं। अपने राष्ट्रीय कार्यक्रमों के बावजूद वह स्त्री शिक्षा, परदा प्रथा बाल-विवाह, दहेज तथा विधवा विवाह से सम्बन्धित कार्यक्रमों से सदा जुड़ी रहीं। विदेशों में भी स्त्री सम्मान की कुरीतियों के विरुद्ध आवाज उठाती रहीं। स्वतन्त्रा प्राप्ति के पश्चात् पं. जवाहरलाल नेहरू ने उनसे उत्तर प्रदेश के राज्यपाल के पद को स्वीकार करने के लिए अनुरोध किया परन्तु वह पूर्ण रूप से अवकाश ग्रहण करना चाहती थीं तो उन्होंने नम्रतापूर्वक अस्वीकार कर दिया। किन्तु महात्मा गांधी के आग्रह को टाल नहीं सकीं और उन्हें लखनऊ के राजभवन में प्रवेश करना पड़ा।
उल्लेखनीय है, उस समय जब सत्ता के गलियारों में राजभाषा हिन्दी का नामोनिशान भी नहीं था तब बंगाल मूल की तेलंगाना निवासी और निजाम के हैदराबाद के उर्दू वाले वातावरण में पली अंग्रेजी में कविता रचने वाली भारत की कोकिला ने राज्यपाल के पद की शपथ हिन्दी में लेना पसन्द किया। उत्तर प्रदेश के राजभवन में राजनीतिकों के अतिरिक्त समाजसेवियों और साहित्यकारों का जमघट लगने लगा। काव्य व संगीत की महफिलों की मधुर गूँज से राजभवन की दीवारें सुखद अश्चर्य से इतराती-इठलाती प्रतीत होने लगीं। उनके लिए यह पहला ही अनुभव था। राजभवन के अधिकारी के अनुसार, मैडम के युग के समान वातावरण तो राजभवन को आज तक नसीब नहीं हुआ। राजभवन की उस शमा (दीपक) ने सारे समाज, जाति व देश को आलोकित कर दिया। यद्यपि वैसा आलोक राजभवन में अधिक समय नहीं रह पाया। अन्ततः 2 मार्च 1948 को वह अलौकिक शमा अपने उद्गम महाप्रकाश में विलीन हो गई। परन्तु उनके द्वारा प्रशस्त विरासत की एक बड़ी और समृद्ध पूँजी को यदि भारत की आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणास्वरूप पथ प्रदर्शक मानकर सेंत रखें तो भारत कोकिला का जीवन सार्थक समझा जाएगा।
